सिन्धु सरस्वती सभ्यता
- कालक्रम- सिन्धु.सरस्वती सभ्यता के काल निर्धारण मे सभी इतिहासकार एक मत नही है। इसका समय 3250 ई॰पू॰ से 2700 ई॰पू॰ तक माना गया है।
- सभ्यता के प्रमुख केन्द्र- सिन्धु.सरस्वती सभ्यता का सबसे पहले परिचय 1856 मे बर्टन बन्धुओ व्दारा दिया गया तथा इस सभ्यता के प्रमुख केन्द्र कि खोज 1921 मे दयाराम सहानी ने पाकिस्तान के हडप्पा नामक स्थान से कि गई। इस कारण इस सभ्यता को हडप्पा सभ्यता भी कहा जाता है। दूसरे प्रमुख केन्द्र कि खोज 1922 मे राखलदास बनर्जी ने मोहनजोदडो मे पता लगाया।
- सिन्धु.सरस्वती सभ्यता कि प्रमुख विशेषताएँ
- सिन्धु स्थापत्य कला- इस सभ्यता कि सबसे प्रमुख विशेषता यहाँ कि निर्माण कला है तथा यह एक सुनियोजित सभ्यता थी जो निम्न प्रकार है-
- नगर नियोजन- सुनियोजित नगर नियोजन यहाँ कि प्रमुख विशेषता थी। प्रत्येक नगर मे ऊँचे चबूतरे पर गढ तथा समतल निचे भाग पर नगर बसा हुआ था। नगर मे समकोण पर काटती हुई चोडी.चोडी सडके थी। जिसकी चैडाई 9 से 34 फीट होती थी। नगरो मे गलिया होती थी तथा यहाँ पर मकान सुनियोजित तरिके से बनाए जाते थे। जिनमे पक्की इट्टो का इस्तेमाल किया जाता था। इनकी आकृति का अनुपात 1रू2रू4 होता था। प्रत्येक घर मे 3.4 कक्ष होते थे तथा स्नानागार, शौचालय, कुँआ व मध्य मे आगन होता था तथा जल निकास प्रणाली बहुत हि अच्छे से बनाई गई थी। घरो के पानी का निकास नालियो से होता था जो कि सडक नालियो मे जाकर गिरता था। इन नालियो के बिच मे चैम्बर होते थे जिससे इनकी साफ.सफाई का ध्यान रखा जाता था।
- विशाल स्नानाघार - मोहनजोदडो का यहाँ महत्वपूर्ण भवन है जिसका आकार 39⤫23⤫8 फिट है। इसके तीन तरफ बरामदे है। फर्श व दिवारो पर ईटो का प्रयोग हुआ था तथा पास हि कुँआ व छोटे.छोट स्नानाघार प्राप्त हुए।
- विशाल अन्नाघार- मोहनजोदडो व हडप्पा से विशाल मालगोदाम के अवशेष मिले है। जिसमे मोहनजोदडो का मालगोदाम 45ण्71⤫15ण्23 मीटर था व हडप्पा का का मालगोदाम 55⤫43 मीटर था।
- विशाल जलाशय व स्टेडियम- गुजरात के धोलावीरा से 16 छोटे.बडे जलाशय प्राप्त हुए तथा दुर्ग मे पाहाड को काटकर जलाशय का निर्माण किया गया। इसके अलावा यहाँ से विशाल स्टेडियम के प्रमाण भी मिले है जिसका आकार 283⤫45 मीटर था।
- बदंरगाह - एस॰एस॰ राव ने गुजरात के लोथल से एक गोदीबाडा या बदंरगाह के बारे मे पता लगाया है जिसका प्रवेश व्दार वर्तमान के विशाखापटनम् के बदंरगाह से भी बडा था।
- सिन्धु.सरस्वती सभ्यता की कला, लिपि एंव विज्ञान -
- कला - इस सभ्यता मे कला के क्षेत्र मे मनके, मृद्भाण्ड, मोहरे, मूर्तियो के उत्कृष्ट प्रमाण प्राप्त हुए है जिनमे योगी कि मूर्ति, नर्तकी कि मूर्ति तथा कूबडदार बैल कि मूर्तिया कला का प्रतीक थी। यहाँ कि मोहरो से हमे चित्रकला के बारे मे भी जानकारी प्राप्त होती है। यहाँ कि लिपि सिंधु.लिपि का अध्ययन अभी तक नही किया जा सका इस लिपि के अवक्षेप मोहरो से पता चलते है यहाँ कि लिपि चित्रात्म लिपि थी। विज्ञान के क्षेत्र मे यहाँ के निवासी गणितिय प्रक्रियाओ से परिचित थे तथा यहाँ पर कई ऐसे प्रदार्थो के अवक्षेप मिले है जो औषधी के काम आते थे। कालीबंगा से एक बालक कि खोपडी के प्रमाण यहाँ कि शल्य चिकित्सा के बारे मे बताते है। यहाँ पर धातुओ को पिघलाने के लिए भट्टियो का निर्माण किया गया था।
- आर्थिक उपलब्धिया -
- कृषि व पशुपालन - यहाँ के नगरो से प्राप्त अन्नाधरो से यह पता चलता है कि यहाँ के नगरो से यह पता चलता है कि यहाँ पर अनाज का उत्पादन अत्यधिक मात्रा मे होता था जिसके कारण यह सभ्यता अत्यधिक सम्पन्न थी। यहाँ पर गेहुँ, जो, ज्वार, दाल, मटर, रागी, साम्बा का उत्पादन होता था। इसके अलावा कपास, खजूर व चावल के भी अवक्षेप प्राप्त हुए है। कालीबंगा से आडी व तिरछी हल की रेखाएँ प्राप्त हुई है जिससे दोहरी फसल के संकेत मिलते है।
- उद्योग.व्यवसाय- यहाँ से हमे ताँबे और काँसे से निर्मित कई कलाकृतिया मिली है। जिससे हमे धातु उद्योग के बारे मे जानकारी प्राप्त होती है। इसके अलावा यहाँ से सोने, चाँदी, मनके व मुहरो कि भी प्राप्त हुई है जो यहाँ के उन्नत व्यवसाय को प्रदर्शित करता है। यहाँ से कपास व सुति वस्त्र के बारे मे भी जानकारी प्राप्त हुई है।
- व्यापार व वाणिज्य- यहाँ पर आन्तरिक एंव विदेशी व्यापार दोनो ही उन्नत अवस्था मे थे। जिनमे निर्मित सामग्री व आभूषणो का व्यापार प्रमुख था। जिनमे ताँबा राजस्थान से सौना मैसुर से, चाँदी अफगानिस्थान से व मनके गुजरात से मगाए जाते थे। मसोपोटामीया के साथ इसके व्यापारिक सम्ंबध थे। व्यापार मे वस्तुविनियम व मापतोल कि व्यवस्था निश्चित होती है।
- सामाजिक जीवन- यहाँ पर समाज मे शासक व महत्वपूर्ण क्रमचारी वर्ग, श्रमिक वर्ग, कृषक वर्ग था। शासक, क्रमचारी गढ मे रहते थे अन्य लोग नगर मे रहते थे। समाज कि छोटी इकाई परिवार था। परिवार मे मातृ सत्तात्मक व्यवस्था थी
- धार्मिक जीवन - यहाँ के लोग प्राकृतिक पूजा करते थे। उनको देवीय रूप प्रदान कर करते थे। मातृ देवी कि उपासना पशुपति कि कल्पना, वृक्ष पूजा, मुर्ति पूजा, जल कि पवित्रता, तप व योग परम्परा यहाँ कि प्रमुख विशेषता थी। कालिंबगा, बनावली व राखीगडी से अग्निकुंड व वेदिकाए मिलि हैं तथा पशुओ को देवताओ के वाहन के रूप मे पुजा जाता था तथा पवित्र स्थान कि परम्परा थी।
- राजनैतिक जीवन- प्रशासनीक दृष्टि से साम्राज्य के 4 बडे केन्द्र थे-
- हडप्पा
- मोहनजोदडो
- कालीबंगा
- लोथल
नगरपालिका प्रशासन के भी संकेत मिलते है तथा यहाँ के लोग शांतिप्रिय थे तथा शासक वर्ग कुशल राज सत्ता पर निंयत्रण रखते थे। इसके प्रमाण हमे विदेशी संस्कृतियो से भी मिलते है। हमारी सभ्यता का प्रभाव विश्व कि अन्य संस्कृतियो पर भी था।
