भील जनजाति
परिचय - यह भारत का तीसरा बडा जनजाति समुह है। शबरी व एकलव्य का सम्बन्ध भी जनजाति से है। भील शब्द कि उत्पत्ति द्राविडियन भाषा के ’बीलू’ शब्द से हुयी है जिसका अर्थ है ’तीरंदाज’।
1. शारिरीक संरचना- यह लोग नाटे हाते है। इनका रंग गहरा काला तथा नाक-चैडी होती है। आँखे-लाल, बाल-रूखे, जबडा-बाहर निकला हुआ, शरीर-सुसंगठीत व सुडौल होता है। यह लोग परिश्रमी और ईमानदार होती है।
2. निवास क्षेत्र - जनजाति दुर्गम व निर्जल पर्वतीय क्षेत्रो मे निवास करते है। यह लोग अरावली, विन्ध्याचल व सतपुडा की पहाडियो व वन क्षेत्रो मे रहते है। भारत मे यह जनजाति राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश तथा महाराष्ट्र मे है। इनके निवास क्षेत्रो मे 33ः भाग पर वन पाए जाते है।
3. आर्थिक क्रिया-कलाप
- आखेट - यह लोग जंगलो मे तीर-कमान से पशुओ का शिकार करते है। पुरूष तालाबो से मछली पकडने का कार्य करते है। अब यह लोग पहाडी क्षेत्रो मे झूमिंग कृषि करते है जिसे ’चिमाता’ तथा मैदानी भाग मे कि जाने वाली कृषि को ’दजिया’ कहते है। भूमि पर 2.3 वर्ष खेती करने के बाद करने के बाद उसे पडत छोड दिया जाता है फिर पुनः साफ करके खेत तैयार किया जाता है। इसको ’दीप्पा कृषि’ कहते है।
- भोजन - भीलो का मुख्य भोजन मक्का है। अवसरो व प्रतिभोजो पर चावल व लापसी बनाते है तथा गेहुँ, चना, उडद, मूँग व सब्जियाँ भी इनके भोजन मे शामिल है। यह जनजाति माँसाहारी होती है। भील लोग मदिरा का अधिक सेवन करते है।
- वस्त्र - पुरूष खाल से बने नेकर तथा स्त्रियाँ पेटीकोट पहनती थी। वर्तमान मे पुरूष कमीज, धौती, साफा या पैंट-शर्ट पहनते है। स्त्रियाँ घाघरा व लूगडी पहनती है। भील चाँदी, पितल, जस्ता व निकिल से बने आभूषण पहनते है।
- निवास गृह- इनके घर प्रकीर्ण प्रकार के होते है। झौपडियाँ खेत के मध्य टीलो पर बनाई जाती है। जिसमे आवास के साथ अन्न भण्डारण व पशुओ को रखने कि भी व्यवस्था होती है। घर कि दिवारे मिट्टी, पत्थर व बाँस से तथा छत खपरेल से बनी होती है। झौपडियो के सामने की दिवार को गोबर, खडिया व लाल गेरू से लिप-पोत कर सजाई जाती है। वर्तमान मे यह पक्के मकानो मे रहने लगे है।
- औजार व बर्तन- इनके औजार धनुष-बाण, तलवार व खंजर है। इनके बाण 2 प्रकार के होते है-
- हरियो
- रोबदो
यह बन्दूको का भी प्रयोग करते है। इनके घरो मे मिट्टी से बने बर्तन, मक्का मिसने कि चक्की, तथा बाँस से बना पालना जरूर पाया जाता है।
4. समाज व संस्कृति- भील अनेक पितृसत्तात्मक समूहो व कुलो मे संगठित है। प्रत्येक कुल के लोग अलग-अलग गाँवो मे रहते है। प्रत्येक कुल का अपना गण चिन्ह होता है। इनमे बहुपत्नी प्रथा पाई जाती है। विवाह का प्रस्ताव वर पक्ष कि ओर से आता है। इनमे कन्या का मुल्य देना पडता है जिसे दापा कहते है। यह प्रकृति पूजक होते है। अधिकांश भील कृषक है। यह भूत-प्रेतो मे भी विश्वास करते है। यह मृतको का दाह-संस्कार करते है। फाइरे-फाइरे भीलो का रणघोष है। इस जनजाति के मुखिया को ’गमेती’ कहा जाता है तथा मार्गदर्शक को ’बोलावा’ कहते है।
5. आधुनिक संस्कृति से सम्पर्क- भीलो का सम्पर्क शहरी क्षेत्रो से होने के कारण ये चतुर व चालाक हो गये है। अब यह बाजार आधारित अर्थव्यवस्था कि ओर बढ रहे है। बाह्म संस्कृति के सम्पर्क मे आने से इनके पहनावे बोलचाल व रहन-सहन मे बदलाव आया है।

